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‘पिकू’ और ‘विक्की डोनर’ से कमज़ोर है अमिताभ-आयुष्मान की ‘गुलाबो सिताबो’

लॉकडाउन के कारण गुलाबो सिताबो (gulabo sitabo) अमेज़न प्राइम वीडियो पर रिलीज़ हो गई है। सीधे डिजिटल प्लेटफ़ार्म पर रिलीज़ होने वाली ये पहली फिल्म बन गई है।

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  • सिनेमा – गुलाबो सिताबों
  • सिनेमा प्रकार – सोशल सटायर
  • अदाकार – अमिताभ बच्चन, आयुष्मान खुराना, विजय राज, बीजेन्द्र काला, फ़ारुख जफ़र
  • निर्देशक – शूजित सरकार
  • अवधि – 2 घंटे 5 मिनट

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प्रस्तावना

लॉकडाउन के कारण गुलाबो सिताबो (gulabo sitabo) अमेज़न प्राइम वीडियो पर रिलीज़ हो गई है। सीधे डिजिटल प्लेटफ़ार्म पर रिलीज़ होने वाली ये पहली फिल्म बन गई है। फिल्म को 200 देशों मे 15 भाषाओं के सबटाइटल्स के साथ रिलीज़ किया गया है।  आइये जानते हैं फिल्म आपका मनोरंजन कर पाएगी या नहीं?

कहानी

गुलाबो सिताबो की कहानी लखनऊ की धरती पर आधारित है। लालची, कंजूस और चिड़चिड़े मिर्ज़ा चुन्नन नवाब (अमिताभ बच्चन) और उसकी हवेली मे रहने वाले किराएदार बांके रस्तोगी (Ayushmann khurrana) के इर्द गिर्द घूमती है।78 साल के मिर्ज़ा का एक पाँव क़ब्र मे लटका है, पर उसे ख़ुद से 17 साल बड़ी अपनी बेगम फ़ातिमा (फ़ारुख ज़फ़र) के मरने का इंतज़ार है। ताकि फ़ातिमा महल हवेली उसकी हो सके।

दूसरी ओर कई सालों से हवेली मे रह रहे और टुच्चा किराया दे रहे बाँके भी हवेली के कमरे पर कब्ज़ा करना चाहता है। छठी कक्षा तक पढ़ा बाँके मां और तीन बहनों के साथ हवेली मे रह रहा है। आटे की चक्की चलाने वाले बाँके पर फ़ौजिया ने शादी का दबाव भी बनाया हुआ है।

मिर्ज़ा और बाँके की आपस मे बिल्कुल नहीं बनती। हर दम ये लड़ते रहते हैं। दूसरी ओर पुरातत्व विभाग के ज्ञानेश शुक्ला (विजय राज) इस हवेली को ऐतिहासिक घोषित करना चाहता है। इस कारण मिर्ज़ा वकील क्रिस्टोफर क्लार्क (बीजेन्द्र काला) की मदद लेता है।

फिर शुरू होती है मिर्ज़ा की हवेली अपने नाम पर करने की जद्दोजहद। दूसरी ओर बाँके भी अपने जैसे दूसरे किराएदारों को साथ लेकर हवेली पर कब्ज़ा बनाए रखने की हर तरह की कोशिशों मे जुट जाता है। तो हवेली मिर्ज़ा की होती है? बांके हवेली पर कब्ज़ा कर पाता है? हवेली की बारिस बेगम का क्या होता है? इन सवालों के जवाब जानने के लिए आपको फिल्म देखनी होगी।

अदाकारी

78 साल के मिर्ज़ा का किरदार निभाने के लिए अमिताभ बच्चन ने काफ़ी मेहनत की है। बड़ी नाक, आँखों पर मोटा चश्मा, झुककर चलना और आवाज़ मे लड़खड़ाहट.. मिर्ज़ा को अमिताभ बच्चन ने बख़ूबी साकारा है। आयुष्मान खुराना ने भी भाषा उच्चार को अच्छे से पकड़ा है। मैले कपड़े, छोटा सा पेट उनके किरदार को निपोरते हैं। इनके अलावा विजय राज, बीजेन्द्र काला और फ़ारुख ज़फ़र ने अच्छी अदाकारी की है।

निर्देशन

पिकू, विक्की डोनर जैसी फिल्में बनाने वाले शूजित सरकार ने फिल्म का निर्देशन किया है। कहानी के अनुसार उन्होने पुराने लखनऊ का अच्छे से दर्शन कराया है। लेकिन कहानी ही धारदार ना हो तो इनका निर्देशन भी क्या कर सकता है।

संगीत

फिल्म मे बेवजह के गाने ठूँसे नहीं गए हैं ये अच्छी बात है लेकिन संगीत औसत दर्जे का है।

ख़ास बातें

  1. अमिताभ बच्चन की अदाकारी।
  2. संदेश से भरपूर।
  3. परिवार संग देख सकते हैं।

कमज़ोर कड़ियां

  1. कहानी दमदार नहीं।
  2. संवाद असरदार नहीं।
  3. उबाती है, अंत तक रुकने के लिए आपके सब्र का कडा इम्तेहान होगा।
  4. मसाला फिल्मों के शौकिनों के लिए कुछ ख़ास नहीं।

देखें या ना देखें

यदि आपके पास अमेज़न प्राइम है और साथ ही बहुत सारा खाली समय, तो आप इसे अमिताभ बच्चन की अदाकई के लिए देख सकते हैं। ज़्यादा उम्मीदे मत रखिए।

रेटिंग – 2.5/5

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