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खानदानी शफाखाना रिव्यू: विषय शानदार पर कहानी कमज़ोर

दबंग गर्ल सोनाक्षी (Sonakshi Sinha) सिन्हा की फिल्म खानदानी शफाखाना (khandaani Shafakhana ) अपने विषय को लेकर चर्चा में बनी हुई है। आइये जानते हैं फिल्म आपका मनोरंजन कर पाएगी या नहीं।

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  • सिनेमा – खानदानी शफाखाना
  • सिनेमा प्रकार – कॉमेडी
  • कलाकार – सोनाक्षी सिन्हा, बादशाह, वरुण शर्मा, अन्नू कपूर, कुलभूषण खरबंदा
  • निर्देशक – शिल्पी दासगुप्ता
  • अवधि – 2 घंटे 17 मिनट

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प्रस्तावना

दबंग गर्ल सोनाक्षी (Sonakshi Sinha) सिन्हा की फिल्म खानदानी शफाखाना (khandaani Shafakhana ) अपने विषय को लेकर चर्चा में बनी हुई है। आइये जानते हैं फिल्म आपका मनोरंजन कर पाएगी या नहीं।

कहानी

पंजाब के छोटे से गाँव की मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव बेबी बेदी (सोनाक्षी सिन्हा) अपने परिवार का गुज़ारा करने और कर्ज़े में डूबे अपने घर को बचाने के लिए जी-तोड़ मेहनत करती है। लेकिन बावजूद उसके उसे कामयाबी नसीब नहीं होती। ऐसे में उसकी ज़िंदगी में उसके मामा हकीम ताराचंद (कुलुभुषण खरबंदा) का खानदानी शफाखाना (सेक्स क्लिनिक) उम्मीद की एक किरण बनकर जगमगाता है। मामा वसीयत में अपना शफाखाना बेबी के नाम कर गुज़रते हैं। मामा की शर्त होती है कि यदि बेबी यहां 6 महीनों तक काम करती है तो यह शफाखाना उसका होगा। उसके बाद वो चाहे तो इसे बेच सकती है।

लेकिन जहां इस विषय पर कोई बात नहीं करता वहां एक लड़की का ऐसे क्लिनिक में आना और इसे चलाना मानो नामुमकिन है। शायद लोहे के चने चबाना बेबी के लिए इससे आसान काम हो सकता है। फिर भी बेबी अपनी मान-मर्यादा को छोड़ शफाखाना चलाने निकल पड़ती है। फिर शुरू होती उसकी असली जंग। समाज के तानों से उसका बुरा हाल हो जाता है। बेबी बेदी को कैसी जंग लड़नी पड़ती है? क्या बेबी बेदी इस काम को अंजाम दे पाती है या उसे इसे बीच में छोड़ना पड़ता है? यह जानने के लिए आपको फिल्म देखनी पड़ेगी।

अदाकारी

अदाकारी में सबसे अधिक प्रभावित करते हैं अन्नू कपूर। हालांकि इनका रोल काफ़ी छोटा है। सोनाक्षी सिन्हा ने भूमिका के साथ न्याय करने का प्रयास किया है। हालांकि वो और बेहतर हो सकती थीं। लगता है वरुण शर्मा अब तक फुकरे के किरदार से बाहर नहीं आ पाए हैं। बादशाह ने एक्टिंग करने की कोशिश की है लेकिन इसमें उनके रैप जैसा जादू नज़र नहीं आया। कुलभूषण खरबंदा हमेशा की तरह छाप छोड़ने में कामयाब हुए हैं।

निर्देशन

शिल्पी दासगुप्ता का निर्देशन साधारण है। विषय गंभीर था। इसे वो और बेहतर ढंग से प्रस्तुत कर सकती थीं।

संगीत

संगीत प्रभावित नहीं करता है।

ख़ास बातें

  1. विषय महत्वपूर्ण है।
  2. संदेश समाज की ज़रूरत है।

कमज़ोर कडियां

  1. स्क्रीनप्ले बहुत कमज़ोर है।
  2. संवाद और बेहतर हो सकते थे।
  3. एक समय के बाद कहानी में आगे क्या होने वाला है यह स्पष्ट हो जाता है।
40%
कमज़ोर

देखें या ना देखें

भले ही मनोरंजन का अभाव है लेकिन विषय थोड़ा हटके है तो आप ऊपर दी गई जानकारी के अनुसार ख़ुद निर्णय लें।

  • रेटिंग

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