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मरजावां मूवी रिव्यू: एक्शन, डायलॉग की भरमार पर स्टोरी कमज़ोर

इन दिनों बॉलीवुड मे साउथ की रिमेक बनाने का बोलबाला है। लेकिन इसी बीच मरजावां (Marjaavaan) एक ऐसी फिल्म है जो किसी साउथ फिल्म की रिमेक तो नहीं बल्कि हूबहू साउथ जैसी बनाई गई है।

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  • सिनेमा – मरजावां
  • सिनेमा प्रकार – एक्शन ड्रामा
  • कलाकार – सिद्धार्थ मल्होत्रा, रितेश देशमुख, तारा सुतारिया, रकुल प्रीत सिंह, रवि किशन
  • निर्देशक – मिलाप ज़वेरी
  • अवधि – 2 घंटे 17 मिनट

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प्रस्तावना

इन दिनों बॉलीवुड मे साउथ की रिमेक बनाने का बोलबाला है। लेकिन इसी बीच मरजावां (Marjaavaan) एक ऐसी फिल्म है जो किसी साउथ फिल्म की रिमेक तो नहीं बल्कि हूबहू साउथ जैसी बनाई गई है। ट्रेलर आकर्षक था जिसमे एक से बढ़कर एक दमदार डायलॉग की भरमार थी। साथ ही रोमांटिक एंगल भी नज़र आया था। कुल मिलाकर दर्शक मारजावां का ट्रेलर देख उत्साहित ज़रूर हुए थे। आइये जानते हैं फिल्म मे भी वो बात है या नहीं।

कहानी

लावारिस रघु (सिद्धार्थ मल्होत्रा) को मुंबई वाटर माफ़िया अण्णा (नासर) सहारा देता है। बचपन मे किए इस एहसान के बदले रघु अण्णा का हर हुक्म मानता है। रघु अण्णा की ताकत होता है। लेकिन अण्णा का असली बेटा विष्णु (रितेश देशमुख) रघु पर जलता है। विष्णु को लगता है कि अण्णा उसे कम और रघु को ज़्यादा प्यार करते हैं। इसलिए विष्णु रघु को ख़ाक मे मिलाना चाहता है।

इसी बीच रघु कि ज़िंदगी मे ज़ोया (तारा सुतारिया) आती है। जो बोल तो नहीं सकती लेकिन जिसके दिल की हर बात रघु को समझ आती है। रघु को ज़ोया से प्यार हो जाता है, लेकिन कुछ ऐसा होता है कि अण्णा और विष्णु के कहने पर रघु को ज़ोया की जान लेनी पड़ती है।

आखिर क्यों रघु ज़ोया पर गोली चलाता है? क्या ज़ोया की जान वाकई चली जाती है? क्या विष्णु अपने इरादों मे कामयाब हो पाता है? क्या रघु अण्णा के खिलाफ़ जाकर विष्णु को सबक़ सिखा पाता है? इन सवालों के जवाब जानने के लिए आपको फिल्म देखनी होगी।

अदाकारी

रितेश देशमुख और सिद्धार्थ मल्होत्रा को एक विलन मे दर्शक खूब पसंद कर चुके हैं। पर इस बार रितेश 3 फूट के बने हैं। रितेश ने अपनी भूमिका के साथ न्याय किया है, लेकिन ये बेहद हटके है और इसमे कई बार हद से ज़्यादा ज्यादती भी हुई है। तो दर्शक इसे स्वीकार कर पाएंगे या नहीं इस पर सवालिया निशान लगता है।  दूसरी ओर सिद्धार्थ मल्होत्रा फुल ऑन मुंबईया स्टाइल मे एक्शन करते नज़र आए हैं। हालांकि ऐसा एक्शन हम 80 के दशक मे ही देख चुके हैं। फिल्म मे सबसे बेहतरीन अदाकारी तारा सुतारिया की लगी है। गूंगी लड़की के किरदार मे वो बहुत प्यारी लगी हैं। रकुल प्रीत सिंह छाप छोडने मे नाकाम रही हैं।

निर्देशन

मिलाप ज़वेरी का निर्देशन सत्यमेव जयते फिल्म की याद दिलाता है। हर सीन मे कूट-कूटकर इमोशन्स डालने की उन्होने कोशिश की है। हालांकि इसमे नाटकीयता ही अधिक लगती है। ऐसा लगता है ज़्यादातर जगह वो और बेहतर काम कर सकते थे।

संगीत

फिल्म का संगीत तनिष्क बागची, मीत ब्रदर्स और पायल देव ने दिया है। ज़्यादातर गाने रीमिक्स किए गए हैं। तुम ही आना, थोड़ी सी जगह दे गाने सुनने मे अच्छे लगते हैं। नोरा फ़तेही का एक तो कम ज़िंदगानी देख दिल मचलता है।

खास बातें

  1. मसाला एंटरटेनर।
  2. तारा सुतारिया की अदाकारी और किरदार।
  3. कुछ दृश्य अच्छे लगते हैं।

कमज़ोर कड़ियां

  1. कहानी बेहद कमज़ोर।
  2. डायलॉग की बेवजह भरमार।
  3. दूसरा हिस्सा और अधिक भटकाता है।
  4. दो-तीन गाने छोड़ दो तो बाकी बेवजह लगते हैं।
  5. नाटकीयता की हद से ज़्यादा लगती है।

देखें या ना देखें

ऊपर दिये बातों को ध्यान से पढ़कर अच्छे से समझकर आप ख़ुद निर्णय लीजिये।

रेटिंग 1.5/5

3
कमज़ोर

देखें या ना देखें

ऊपर दिये बातों को ध्यान से पढ़कर अच्छे से समझकर आप ख़ुद निर्णय लीजिये।
रेटिंग 1.5/5

  • रेटिंग 3

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