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सांड की आंख मूवी रिव्यू: उम्मीदों पर खरी नहीं उतर पाई तापसी-भूमि की ये फ़िल्म

भूमि पेडनेकर ( Bhumi Pednekar) और तापसी पन्नू (Taapsee Pannu) 'सांड की आंख' (Saand Ki Aankh) एक बायोग्राफिकल फिल्म है। यह फिल्म भारत की सबसे उम्रदराज शार्पशूटर्स चंद्रो तोमर और प्रकाशी तोमर  के जीवन पर आधारित है। आइये देखते हैं फिल्म भी आपको प्रभावित करती है या नहीं।

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  • सिनेमा – सांड की आंख
  • सिनेमा प्रकार – बायोग्राफि, ड्रामा
  • अदाकार –तापसी पन्नू, भूमि पेडणेकर, प्रकाश झा, विनीत कुमार आदि
  • निर्देशक –तुषार हीरानंदानी
  • अवधि – 2 घंटा 10 मिनट

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प्रस्तावना

‘सांड की आंख’ (Saand Ki Aankh) एक बायोग्राफिकल फिल्म है, जो भारत की सबसे उम्रदराज शार्पशूटर्स चंद्रो तोमर और प्रकाशी तोमर  के जीवन पर आधारित है। पश्चिम उत्तरप्रदेश की रहने वाली चंद्रो तोमर और प्रकाशी तोमर ने सामजिक परिस्थितियों के विरोध जाकर  60 साल की उम्र में शूटिंग सीखी। दोनो  महिलाओं ने कई सारी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय शूटिंग प्रतियोगिताओं में गोल्ड मेडल भी जीता। वहीं ‘सांड की आंख’ फिल्म के ज़रिए इन दो निशाने बाजों की जीवनी को पर्दे पर उतारने की कोशिश की है एक्ट्रेस भूमि पेडनेकर ( Bhumi Pednekar) और तापसी पन्नू (Taapsee Pannu) ने। तो चलिए आपको बताते हैं फिल्म के बारे में

कहानी

बागपत के जोहर गांव में रहने वाली चंद्रो (भूमि पेडनेकर) और प्रकाशी (तापसी पन्नू) देवरानी-जेठानी हैं। दोनो  गांव में सीधा सादा जीवन व्यतित करती हैं। पति की सेवा करने के अलावा घर, खेती बाड़ी और भट्टी चलाना बस यहीं तक दोनो का जीवन सिमट हुआ है। पर 60 साल की जीवन बिताने के बाद चंद्रो और प्रकाशी को अपने अंदर छुपे हुए निशानेबाजी के टैलंट के बारे में पता चला है। समजिक परिस्थितियों के बीच जाकर दोनो शूटर बनने का ख्वाब संजोने लगती हैं। तब इस सपने को पूरा करने में डॉक्टर से शूटर बने डॉक्टर यशपाल (विनीत कुमार सिंह) उनकी मदद करने लगते हैं। आखिरकार में कई चैंपियनशिप में मेडल जीत दोनो की मेहनत रंग लाती है। पर इस सपने को पूरा करने के बीच चंद्रो और प्रकाशी के सामने जो पितृसत्तातमक समाज की  चुनातियां आती हैं, और वह इसका कैसे मुकाबला करती हैं ये सब जानने के लिए आपको पूरी फिल्म देखनी होगी।

अदाकारी

चंद्रो और प्रकाशी के किरदार में ढ़लने के लिए तापसी और भूमि ने अच्छी कोशिश की है। पर दोनो का भयानक मेकअप उनके अभिनय पर भारी पड़ रहा था। खराब प्रोस्थेटिक मेकअप उन्हे उम्रदराज दिखाने में असफल दिख रहा है। वहीं भाषा में भी दोनो एक्ट्रेस की कमज़ोर पकड़ दिखाई दे रही है, ख़ासकर भूमि की। पर निर्देशक-निर्माता प्रकाश झा घर के मुखिया के रूप में अपने अभिनय की शानदार छाप छोड़ी है।

निर्देशन और छायाकारी

फिल्म के निर्देशन पर तुषार हिरानंदानी पर काफी मेहनत की है। हालांकि फिल्म के पहले सीन में तुषार की मेहनत रंग लाई है। पर आगे जाकर फिल्म के ज्यादातर दृश्य अंत में क्या होगा? इसकी भविष्यवाणी पहले से ही करने लगते हैं। ऐसे में दर्शकों को अंत तक बांध कर रखना फिल्म के लिए बेहद मुश्किल है।

संगीत

विशाल मिश्रा द्वारा फिल्म का संगीत शानदार है। ‘उड़ता तीतर’ और ‘वुमनिया’ जैसे गाने याद रखने लायक हैं। ‘उड़ता तीतर’ में सुनिधि चौहान की दमदार अवाज आपको झूमने के लिए मजबूर कर देगी।

ख़ास बातें

  • फिल्म के डायलॉग अच्छे हैं।
  • प्रकाश झा की अदाकारी
  • ‘उड़ता तीतर’ और ‘वुमनिया’ गाना अच्छा है

कमज़ोर कड़ियां

  • दोनो एक्ट्रेसेस का भयानक मेकअप
  • भूमि पेडनेकर की भाषा पर कमज़ोर पकड़

देखें या न देखें

अगर आप भूमि और तापसी के फैन हैं तो फिल्म देखने जा सकते हैं।

रेटिंग

1.5/5

 

80%
Awesome
  • Design

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